अल्फ़ाज़ों में तर्क: शायरी और क्रिटिकल थिंकिंग का रिश्ता
मुझे आज भी वो दिन अच्छी तरह याद है। मेरे पिताजी, जो पेशे से एक सुनार थे। अक्सर हमारी दुकान पर उनके दोस्तों से बातों का सिलसिला शुरू हो जाता था। चर्चा बाजार के हाल-चाल से शुरू होती और न जाने कब ज़िंदगी और मौत के गहरे फलसफे तक जा पहुँचती। ऐसे ही एक दिन, ज़िंदगी की नश्वरता पर बात करते हुए उन्होंने कहा था: ये ज़िंदगी के मेले, दुनिया में कम न होंगे, अफ़सोस हम न होंगे - (शकील बदायूंनी) बात बहुत सीधी सी थी—कभी अपने वजूद पर घमंड मत करो। हम रहें या न रहें, यह दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी और काम होते रहेंगे। पिताजी अक्सर ऐसे मौकों पर शायरी का सहारा लिया करते थे, जो सीधे दिल और दिमाग पर असर करती थी। अब जब बात घमंड और अहंकार की चल ही निकली है, तो देखिए न,उपनिषद भी तो यही कहते हैं। जीवन की असली यात्रा अहंकार से छुटकारा पाने, अंधविश्वास और भ्रम से दूर रहने की ही तो यात्रा है। लेकिन, किंतु, परंतु... इंसान चाहे मंदिर-मस्जिद के कितने भी चक्कर काट ले, उसका घमंड अक्सर वहीं का वहीं रहता है। इस 'क्रिटिकल थिंकिंग' को समझने के लिए चलिए सूफी संत बाबा बुल्ले शाह के पास चलते हैं: मक्के गयां, गल म...