अल्फ़ाज़ों में तर्क: शायरी और क्रिटिकल थिंकिंग का रिश्ता

   मुझे आज भी वो दिन अच्छी तरह याद है। मेरे पिताजी, जो पेशे से एक सुनार थे। अक्सर हमारी दुकान पर उनके दोस्तों  से बातों का सिलसिला शुरू हो जाता था। चर्चा बाजार के हाल-चाल से शुरू होती और न जाने कब ज़िंदगी और मौत के गहरे फलसफे तक जा पहुँचती। ऐसे ही एक दिन, ज़िंदगी की नश्वरता पर बात करते हुए उन्होंने कहा था:



ये ज़िंदगी के मेले, दुनिया में कम न होंगे, अफ़सोस हम न होंगे - (शकील बदायूंनी)


बात बहुत सीधी सी थी—कभी अपने वजूद पर घमंड मत करो। हम रहें या न रहें, यह दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी और काम होते रहेंगे। पिताजी अक्सर ऐसे मौकों पर शायरी का सहारा लिया करते थे, जो सीधे दिल और दिमाग पर असर करती थी।


अब जब बात घमंड और अहंकार की चल ही निकली है, तो देखिए न,उपनिषद भी तो यही कहते हैं। जीवन की असली यात्रा अहंकार से छुटकारा पाने, अंधविश्वास और भ्रम से दूर रहने की ही तो यात्रा है।


लेकिन, किंतु, परंतु... इंसान चाहे मंदिर-मस्जिद के कितने भी चक्कर काट ले, उसका घमंड अक्सर वहीं का वहीं रहता है। इस 'क्रिटिकल थिंकिंग' को समझने के लिए चलिए सूफी संत बाबा बुल्ले शाह के पास चलते हैं:


मक्के गयां, गल मुकदी नाहीं, पावें सौ सौ हज कर आईए।
गंगा गयां, गल मुकदी नाहीं, पावें सौ सौ गोते खाइए।
बुल्ले शाह गल ताईयों मुकदी, जदों 'मैं' नू दिलों गवाईए।


बात कितनी आसान और गहरी है! इंसान चाहे सौ बार हज करके आ जाए, या गंगा नदी में सौ बार डुबकी लगा ले, लेकिन सिर्फ इससे जीवन का असली मकसद पूरा नहीं होता। तलाश केवल तभी पूरी होती है, जब इंसान अपने भीतर बैठी इस "मैं" (Ego) को हमेशा के लिए मिटा देता है। आज के दौर में यह अहंकार हर जगह देखने को मिलता है, चाहे वह हमारी प्रोफेशनल लाइफ हो या पर्सनल। लोग अक्सर यह सोचने लगते हैं कि यह दुनिया या कंपनी उन्हीं के दम पर चल रही है।


चलिए, पन्ने पलटते हैं और विषय थोड़ा बदलते हैं। पिछले दिनों मैं अपने एक पुराने छात्र से मिलने गया, जो शुरुआती दिनों में मुझसे रुड़की में C/C++ पढ़ा करता था। बातों-बातों में जिक्र छिड़ा कि आज की दुनिया में लोगों ने 'सफलता' का पैमाना केवल पैसे को मान लिया है। लोग पैसा कमाने में अपनी पूरी ज़िंदगी निकाल देते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या वो एक अच्छे इंसान बन पाए? क्या उनमें कोई और टैलेंट या शौक बाकी है—जैसे खेल, संगीत या साहित्य से लगाव?


कम शब्दों में कहूं तो, ज़िंदगी एक गुलदस्ते की तरह है। अब यह आपको तय करना है कि उस गुलदस्ते में सिर्फ एक ही रंग के फूल हों, या अलग-अलग रंगों के।


तो फिर ज़िंदगी कैसी होनी चाहिए? इसका जवाब इन पंक्तियों में मिलता है:


कुछ भी पाये गर्व न करियो, दुनिया आणि जानी है

तेरे साथ जहां से तेरी, परछाई भी जानी है

सब को अपना प्यार बांटना, मीठा बोल बोलना जी


करना फकीरी फिर क्या दिलगिरी, सदा मगन में रेहना जी.

कोई दिन गाड़ी न, कोई दिन बांग्ला, कोई दिन जंगल बासना न जी

(संतोष आनंद)


इन खूबसूरत पंक्तियों को लिखने वाले संतोष आनंद जी से मेरी मुलाकात साल 2018 में 'जश्न-ए-अदब' कार्यक्रम में हुई थी। ज़िंदगी किसी इंसान के प्रति कितनी बेरहम हो सकती है, यह उन्हें देखकर समझ में आता है। लेकिन, अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव में भी उनकी ज़िंदादिली और संघर्ष करने का उनका जज़्बा हम सभी के लिए एक बहुत बड़ी सीख है। हिंदी सिनेमा को उन्होंने न जाने कितने अर्थपूर्ण और फलसफे से भरे गीत दिए हैं।


सच कहूं तो, जब बात 'क्रिटिकल थिंकिंग' यानी, चीजों को गहराई से समझने और तर्क करने की क्षमता की आती है, तो साहित्य और शायरी से बेहतर कोई गुरु हो ही नहीं सकता। 

क्योंकि अंत में ज्ञान ही काम आता है, स्वर्ग नहीं! मुझे अब इक़बाल साहब याद आ रहे हैं, जो कह रहे है …


सजदों के इवज़ फिरदौस मिले, ये बात मुझे मंज़ूर नही,

बे-लूस इबादत करता हूँ बंदा हूँ तेरा मज़दूर नही

(इक़बाल)


इक़बाल जी की ये दो पंक्तियां कितनी सटीक हैं! भगवान से प्रार्थना के बदले कुछ मांगो मत, सिर्फ निष्काम भाव से अपने कर्म करते रहो। भगवद गीता की भी तो यही कहानी है।


सोचने बैठें तो इस विषय पर कितना भी लिखा जा सकता है, क्योंकि विचारों के इस आसमान की कोई सीमा नहीं है।



Sachin Dhiman


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